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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 50
गुरुसमीरसमीरितभूधरा इव गजा गगनं विजगाहिरे । गुरुतरा इव वारिधरा रथा भुवमितीह विवर्त इवाभवत् ॥
हाथी ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो प्रबल वायु से चलित पर्वत आकाश में प्रवेश कर रहे हों और रथ ऐसे लगते थे मानो भारी बादल पृथ्वी पर उतर आए हों—यह दृश्य मानो उलट गया हो।
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