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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 47
घण्टारवै रौद्रतरैर्निरन्तरं विसृत्वरैर्गर्जरवैः सुभैरवैः । मत्तद्विपानां प्रथयाम्बभूविरे न वाहिनीनां पटहस्य निःस्वनाः ॥
मत्त हाथियों की भयंकर घंटियों और गर्जन की निरंतर ध्वनि से सेना के नगाड़ों की आवाज दब गई।
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