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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 46
इतस्ततो वातविधूत चञ्चलैर्नोरन्ध्रिताशागमनैर्ध्वजांशुकैः । लक्षैः क्वणत्काञ्चनकिङ्किणीकुलैरमज्जि धूलीजलधौ नभोगते ॥
वायु से हिलते हुए ध्वजों और उनके स्वर्णघंटिकाओं की झंकार से युक्त असंख्य ध्वजों के कारण आकाश धूलरूपी समुद्र में डूबा हुआ प्रतीत हुआ।
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