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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 43
दन्तीन्द्रदानद्रववारिवीचिभिः सद्योऽपि नद्यो बहुधा पुपूरिरे । धारा रजोभिस्तुरगैः क्षतैर्भूता याः पङ्कतामेत्य रथैः स्थलीकृताः ॥
हाथियों के मदजल की तरंगों से नदियाँ भर गईं और घोड़ों से उड़ती धूल से बनी धाराएँ कीचड़ बनकर रथों द्वारा समतल भूमि में परिवर्तित हो गईं।
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