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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 41
उद्दामदानद्विपवृन्द बृंहितैर्नितान्तमुत्तुङ्गतुरङ्ग हेषितैः । चलद्धनस्यन्दननेमिनिःस्वनैरभून्निरुच्चासमिवाकुलं जगत् ॥
मद से उन्मत्त हाथियों की गर्जना, ऊँचे घोड़ों की तीव्र हिनहिनाहट और चलते रथों के पहियों की ध्वनि से सम्पूर्ण जगत मानो अत्यन्त व्याकुल और गूँजता हुआ प्रतीत होने लगा।
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