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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 4
शरच्चरच्चन्द्रमरीचिपाण्डुरैः संवीज्यमानो वरचारुचामरैः । पुरःसरैः किन्नरसिद्धचारणै रणेच्छुरस्तूयत वाग्भिरुल्बणैः ॥
शरदकालीन चन्द्रकिरणों के समान श्वेत चामरों से सेवित होता हुआ, किन्नर, सिद्ध और चारणों द्वारा अग्रसर होकर, युद्ध के इच्छुक उस कुमार की प्रबल वाणी से स्तुति की जा रही थी।
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