नोर्ध्वं न चाधो न पुरो न पृष्ठतो न पार्श्वतोऽभूत्खलु चक्षुषोर्गतिः । सूच्यग्रभेद्यैः पृतनारजश्चयैराच्छादिता प्राणिगणस्य सर्वतः ॥
चारों ओर इतनी घनी धूल छा गई कि न ऊपर, न नीचे, न आगे, न पीछे, न ही किसी ओर दृष्टि जा सकती थी; सब ओर प्राणी धूल से ढक गए थे।
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