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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 37
विलोक्य धूलीपटलैर्भृशं भृतं द्यावापृथिव्योरलमन्तरं महत् । किमूर्ध्वतोऽधः किमधस्त ऊर्ध्वतो रजोऽभ्युपैतीति जनैरतर्कात ॥
धूल के घने पटलों से आकाश और पृथ्वी के मध्य का अंतर भर जाने पर लोग यह समझ नहीं पाए कि धूल ऊपर जा रही है या नीचे।
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