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कुमारसंभवम् • अध्याय 14 • श्लोक 32
महास्वनः सैन्यविमर्दसम्भवः कर्णान्तकूलङ्कषतामुपेयिवान् । पयोनिधेः क्षुब्धतरस्य वर्धनो बभूव भूम्ना भुवनोदरम्भरिः ॥
सेना के घर्षण से उत्पन्न महान शब्द, जो कानों को विदीर्ण कर देता था, अत्यन्त उग्र समुद्र की गर्जना के समान समस्त जगत को भरने वाला बन गया।
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