स दुर्निवारं मनसोऽतिवेगिनं जयश्रियः सन्नयनं सुदुःसहम् । विजित्वरं नाम तदा महारथं धनुर्धरः शक्तिधरोऽध्यरोहयत् ॥
वह धनुर्धर और शक्तिधारी कुमार उस समय ‘विजित्वर’ नामक महारथ पर आरूढ़ हुआ, जो मन की गति से भी अधिक वेगवान, दुर्निवार और विजयलक्ष्मी को आकर्षित करने वाला था।
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