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कुमारसंभवम् • अध्याय 13 • श्लोक 43
निसर्गकल्पद्रुमतोरणं तं स पारिजातप्रसवस्रगाढ्यम् । दिव्यैः कृतस्वस्त्ययनं मुनीन्द्रैरन्तः प्रविष्टप्रमदं प्रपेदे ॥
स्वाभाविक कल्पवृक्षों के तोरणों और पारिजात पुष्पमालाओं से सुसज्जित तथा मुनियों द्वारा स्वस्तिवाचन से युक्त उस भवन में प्रवेश कर वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
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