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कुमारसंभवम् • अध्याय 13 • श्लोक 40
आविर्भवद्वालतृणाश्चितानां तदीयलीलागृहदीर्घिकाणाम् । स दुर्दशां वीक्ष्य विरोधिजातां विषादवैलक्ष्यभरे बभार ॥
जहाँ उसकी लीलागृहों की दीर्घिकाओं में बालवत उगे हुए तृण प्रकट हो गए थे, उस शत्रुजनित दुर्दशा को देखकर वह अत्यन्त विषाद और खिन्नता से भर गया।
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