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कुमारसंभवम् • अध्याय 13 • श्लोक 4
तमङ्कमारोप्य सुता हिमाद्रेराश्लिष्य गाढं सुतवत्सला सा । शिरस्युपाघ्राय जगाद शत्रु जित्वा कृतार्थीकुरु वीरसूं माम् ॥
हिमालय की पुत्री ने उसे गोद में उठाकर स्नेहपूर्वक आलिंगन किया और उसके सिर को सूँघकर कहा—हे वीर, शत्रु को जीतकर मुझे कृतार्थ करो।
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