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कुमारसंभवम् • अध्याय 13 • श्लोक 34
सुरद्विषोपप्लुतमेवमेतद्वनं बलस्य द्विषतो गतश्चि । इत्थं विचिन्त्यारुणलोचनोऽभूद्र झुभङ्गदुष्प्रेक्ष्यमुखः स कोपात् ॥
यह वन देवद्वेषी शत्रु के बल से नष्ट हुआ है—ऐसा विचार कर उसका नेत्र अरुण हो गया और क्रोध से उसका मुख विकृत होकर देखने योग्य न रहा।
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