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कुमारसंभवम् • अध्याय 13 • श्लोक 32
प्रणर्तितस्मेरसरोजराजिः पुरः परीरम्भमिलन्महोर्मिः । कपोलपालिश्रमवारिहारी भेजे गुहं तं सरितः समीरः ॥
उस सरिता का समीर, जो हिलते हुए मुस्कानयुक्त कमलों से युक्त था और जिसकी बड़ी तरंगें मानो आलिंगन कर रही थीं, गुह के कपोलों के पसीने को हरता हुआ उसे स्पर्श करने लगा।
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