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कुमारसंभवम् • अध्याय 13 • श्लोक 11
पुरो भव त्वं, न पुरो भवामि, नाहं पुरोगोऽस्मि, पुरः सरस्त्वम् । इत्थं सुरास्तत्क्षणमेव भीताः स्वर्ग प्रवेष्टुं कलहं वितेनुः ॥
तुम आगे चलो, मैं आगे नहीं चलता; मैं अग्रणी नहीं हूँ, तुम ही आगे बढ़ो—इस प्रकार भयभीत देवताओं ने उसी क्षण स्वर्ग में प्रवेश करने को लेकर आपस में विवाद करना शुरू कर दिया।
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