सुरपरिवृढः प्रौढं वीरं कुमारमुमापते-बलवदमरारातिस्त्रीणां दृगञ्जनभञ्जनम् । जगदभयदं सद्यः प्राप्य प्रमोदपरोऽभवद्-ध्रुवमभिमते पूर्ण को वा मुदा न हि माद्यति ॥
देवताओं से घिरे हुए, उमा के पति का वह प्रौढ़ और पराक्रमी पुत्र, जो देवशत्रुओं की स्त्रियों के नेत्रों का काजल नष्ट करने वाला और जगत को निर्भय करने वाला था, उसे प्राप्त करके सब अत्यन्त आनंदित हो उठे—निश्चय ही अभिलाषा पूर्ण होने पर कौन आनंदित नहीं होता?
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