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कुमारसंभवम् • अध्याय 12 • श्लोक 35
अहो बतानन्तपराक्रमाणां दिवौकसो वीरवरायुधानाम् । हिमोद‌बिन्दुग्लपितस्य किं यः पद्मस्य दैन्यं दद्धते मुखानि ॥
अहो! अनन्त पराक्रम और श्रेष्ठ आयुधों से युक्त देवताओं के मुख ऐसे कैसे हो गए, जैसे शीतबिंदुओं से मुरझाए हुए कमल की दीन अवस्था हो जाती है?
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