हजार नेत्रों से महेश्वर को देखकर इन्द्र अत्यन्त कृतार्थ हुआ, किन्तु उनके सर्वांग में स्थित वैचित्र्य को उसने कभी-कभी प्रिय के कोप के समान विलक्षण भी अनुभव किया।
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