तथाविधं शैलसुताधिनार्थ पुलोमपुत्रीदयितो निरीक्ष्य । आसीत्क्षण क्षोभपरो नु कस्य मनो न हि क्षुभ्यति धामधाग्नि ॥
उस प्रकार शैलसुता के प्रिय पुत्र को देखकर पुलोमा की पुत्री के प्रिय इन्द्र क्षणभर के लिए चंचल हो उठा—किसका मन ऐसे तेजस्वी अग्नि के समान धाम को देखकर विचलित नहीं होता?
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