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कुमारसंभवम् • अध्याय 12 • श्लोक 21
शस्त्रास्त्रविद्याभ्यसनैकसक्ते सविस्मयैरेत्य गणैः सुदृष्टे । नीराज्यमाने स्फटिकाचलेन सानन्दनिर्दिष्टदृशं कुमारे ॥
शस्त्र और अस्त्रविद्या के अभ्यास में पूर्णतया रत उस कुमार को, आश्चर्य से भरे गणों द्वारा निहारते हुए, स्फटिक पर्वत के समान उज्ज्वल स्थान में आरती की जाती हुई देख, सबकी दृष्टि आनंद से उसी पर स्थिर हो गई।
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