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कुमारसंभवम् • अध्याय 12 • श्लोक 17
पुरातनी ब्रह्मकपालमालां कण्ठे वहन्तं पुनराश्वसन्तीम् । उद्गीतवेदां मुकुटेन्दुवर्षत्सुधा भरौघाप्लवलब्धसंज्ञाम् ॥
गले में प्राचीन ब्रह्मकपालों की माला धारण किए हुए, जो वेदों के उच्चारण से पुनः चेतना प्राप्त करती हुई प्रतीत होती थी और मुकुट के चन्द्रमा से बरसती अमृतधारा से सिंचित थी।
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