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कुमारसंभवम् • अध्याय 12 • श्लोक 14
स्वबद्धया कण्ठिकयेव नीलमाणिक्यमय्या कुतुकेन गौर्याः । नीलस्य कण्ठस्य परिस्फुरन्त्या कान्त्या महत्या सुविराजमानम् ॥
गौरी द्वारा प्रेमपूर्वक धारण की गई नीलमणि की कण्ठिका के समान, अपने नीलकण्ठ की उज्ज्वल आभा से अत्यन्त शोभायमान था।
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