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कुमारसंभवम् • अध्याय 12 • श्लोक 13
महार्हरत्नाश्चितयो रुदारं स्फुरत्प्रभामण्डलयोः समन्तात् । कर्णस्थिताभ्यां शशिभास्कराभ्यामुपासितं कुण्डलयोश्छलेन ॥
महामूल्यवान रत्नों से सुसज्जित और चारों ओर चमकते प्रभामंडल से युक्त, कानों में स्थित कुण्डलों के बहाने चन्द्र और सूर्य द्वारा सेवित प्रतीत होता था।
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