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कुमारसंभवम् • अध्याय 12 • श्लोक 11
गङ्गातरङ्गप्रतिबिम्बितैः स्वैर्बहूभवन्तं शिरसा सुधांशुम् । चलन्मरीचिप्रचयैस्तुषारगौरैर्हिमद्योतितमुद्वहन्तम् ॥
अपने मस्तक पर गंगा की तरंगों में प्रतिबिंबित होकर अनेक रूप धारण करने वाले चन्द्रमा को धारण करते हुए, जो चलती किरणों के समूह से हिम के समान श्वेत आभा से दीप्तिमान प्रतीत होता था।
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