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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 5
निसर्गवात्सल्यवशाद्विवृद्धचेतः प्रमोदौ गलदश्रुनेत्रौ । अपश्यतां तं गिरिजागिरीशौ षडाननं षङ्गिनजातमात्रम् ॥
स्वाभाविक स्नेह से उनके हृदय अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और उनकी आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे; तब गिरिजा और शिव ने उस नवजात षडानन बालक को देखा।
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