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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 49
इत्थं शिशोः शैशवकेलिवृत्तैर्मनोभिरामैर्गिरिजागिरीशौ । मनोविनोदैकरसप्रसक्तौ दिवानिशं नाविदतां कदाचित् ॥
इस प्रकार उस बालक की मनोहर बाललीलाओं में निमग्न होकर गिरिजा और गिरीश दिन-रात एकरस आनंद में लीन रहते और समय का भान नहीं होता था।
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