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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 48
किञ्चित्कलं भङ्गुरकन्धरस्य नमज्जटाजूटधरस्य शम्भोः । प्रलम्बमानं किल कौतुकेन चिरं चुचुम्बे मुकुटेन्दुखण्डम् ॥
वह कभी झुके हुए जटाधारी शम्भु के मस्तक पर लटकते चन्द्रखण्ड को कौतूहल से लंबे समय तक चूमता रहता था।
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