शम्भोः शिरोऽन्तः सरितस्तरङ्गान्विगाह्य गार्ड शिशिरानसेन । स जातजादपं निजपाणिपद्ममतापयद्भालविलोचनात्री ॥
वह शम्भु के सिर में स्थित गंगा की शीतल तरंगों में अपनी नासिका डालकर अपने कमल समान हाथों से उस जल को लेकर शिव के ललाट नेत्र को शीतल करने लगा।
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