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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 46
कपर्दिकण्टान्तकपालदान्नोऽङ्गुलिं प्रवेश्याननकोटरेषु । दन्तानुपान्तुं रभसी बभूव मुक्ताफलभ्रान्तिकरः कुमारु ॥
वह अपनी उँगलियाँ शिव की जटाओं और कपाल के समीप मुख में डालकर उनके दाँतों को छूने का प्रयास करता, मानो उन्हें मोतियों के समान समझ रहा हो।
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