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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 44
गृह्णन्विषाणे हरवाहनस्य स्पृशन्नुमा केसरिणं सलीलम् । स भृङ्गिणः सूक्ष्मतरं शिखयं कर्षन्बभूव प्रमदाय पित्रोः ॥
वह कभी शिव के वाहन नंदी के सींग पकड़ता, कभी पार्वती के सिंह को स्पर्श करता और भृंगी की सूक्ष्म जटा को खींचता हुआ माता-पिता के लिए आनंद का कारण बनता था।
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