ततः कुमारः समुर्दा निदानैः स बाललीलाचरितैर्विचित्रैः । गिरीशगौर्योहृदयं जहार मुदे न हृह्या किमु बालकेलि ॥
तत्पश्चात वह कुमार अपने विविध बाललीलाओं के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित होकर शिव और पार्वती के हृदय को आनंद से भरने लगा—बालक की क्रीड़ाएँ भला किसका मन नहीं हर लेतीं?
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