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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 37
बाता ववुः सौख्यकराः प्रसेदुराशा विधूमो हुतभुग दिदीपे । जलान्यभूवन्विमलानि तत्रोत्सवेऽन्तरिक्षे प्रससाद सद्यः ॥
शीतल और सुखद वायु बहने लगी, दिशाएँ शांत हो गईं, अग्नि धुएँ से रहित होकर उज्ज्वल रूप से प्रज्वलित हुई, जल निर्मल हो गया और आकाश भी उस उत्सव में तुरंत प्रसन्न हो उठा।
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