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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 35
सुमङ्गलोपायन पात्रहस्तास्तं मातरो मातृवदभ्युपेताः । विधाय दूर्वाक्षतकानि मूर्ध्नि निन्युः स्वमङ्क गिरिजातनूजम् ॥
मंगलोपहार लिए हुए माताएँ मातृत्वभाव से उसके पास आईं, उसके मस्तक पर दूर्वा और अक्षत रखकर उसे अपनी गोद में लेकर स्नेहपूर्वक दुलारने लगीं।
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