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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 23
निसर्गवात्सल्यरसौघसिक्ता सान्द्रप्रमोदामृतपूरपूर्णा । तमेकपुत्रं जगदेकमाताभ्युत्सङ्गिनं प्रस्त्रविणी बभूव ॥
स्वाभाविक वात्सल्य के प्रवाह से सिंचित और गहन आनंदामृत से पूर्ण वह जगत की एकमात्र माता अपने उस एकमात्र पुत्र को गोद में लेकर स्नेह से परिपूर्ण हो गई।
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