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कुमारसंभवम् • अध्याय 11 • श्लोक 20
तमीक्षमाणा क्षणमीक्षणानां सहस्रमाप्तुं विनिमेषमैच्छत् । सा नन्दनालोकनमङ्गलेषु क्षणं क्षणं तृप्यति कस्य चेतः ? ॥
उसे देखते हुए वह एक क्षण में ही हजारों नेत्रों का लाभ प्राप्त करना चाहती थी; उस पुत्र के दर्शन के शुभ अवसर में कौन ऐसा है जिसका मन प्रत्येक क्षण तृप्त न हो?
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