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कुमारसंभवम् • अध्याय 10 • श्लोक 55
रौद्रं सुदुर्धरं धाम दधाना दहनात्मकम् । परितापमवापुस्ता मन्ना इव विषाम्बुधौ ॥
उस रौद्र और दुर्धर अग्नि स्वरूप तेज को धारण कर वे अत्यंत तप्त हो गईं, जैसे विष के समुद्र में डूबी हों।
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