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कुमारसंभवम् • अध्याय 10 • श्लोक 37
तत्र माहेश्वरं धाम सञ्चक्राम हविर्भुजः । गङ्गायामुत्तरङ्गायामन्तस्तापविपद्धति ॥
वहाँ हवि भक्षक अग्नि गंगा की लहरों में स्थित महेश्वर के तेज में प्रविष्ट हुआ और उसका आंतरिक ताप नष्ट हो गया।
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