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कुमारसंभवम् • अध्याय 10 • श्लोक 23
अमीषां सुरसङ्घानां त्वमेकोऽर्थसमर्थने । विपत्तिरपि संश्लाघ्योपकारव्रतिनोऽनल ॥
हे अग्नि, इन देवसमूहों के कार्य सिद्ध करने में तुम ही समर्थ हो; उपकार में लगे रहने वालों के लिए विपत्ति भी प्रशंसनीय होती है।
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