निधत्से हुतमर्काय, स पर्जन्योऽभिवर्षति । ततोऽन्नानि, प्रजास्तेभ्यस्तेनासि जगतः पिता ॥
तुम अर्पित हवि को सूर्य तक पहुँचाते हो, उससे वर्षा होती है, उससे अन्न उत्पन्न होता है और उससे प्रजा जीवित रहती है—इस प्रकार तुम जगत के पिता हो।
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