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कुमारसंभवम् • अध्याय 10 • श्लोक 19
हवींषि मन्त्रपूतानि हुताश ! त्वयि जुहृतः । तपस्विनस्तपः सिद्धिं यान्ति, त्वं तपसां प्रभुः ॥
हे अग्नि, मंत्रों से पवित्र हवि तुम्हारे द्वारा अर्पित होती है और तपस्वी तप से सिद्धि प्राप्त करते हैं, क्योंकि तुम तप के स्वामी हो।
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