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कुमारसंभवम् • अध्याय 10 • श्लोक 14
रौद्रेण दह्यमानस्य महसातिमहीयसा । मम प्राणपरित्राणप्रगुणी भव वासव ॥
हे वासव, उस अत्यंत प्रचंड तेज से जलते हुए मेरे प्राणों की रक्षा करने में समर्थ बनो।
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