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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 60
अवचितबलिपुष्पा वेदिसम्मार्गदक्षा नियमविधिजलानां बर्हिषां चोपनेत्री । गिरिशमुपचचार प्रत्यहं सा सुकेशी नियमितपरिखेदा तच्छिरश्चन्द्रपादैः ॥
वह सुकेशी प्रतिदिन बलि के लिए पुष्प एकत्र करती, वेदी को साफ करने में दक्ष थी, नियमपूर्वक जल और कुश लाती हुई, अपने श्रम को नियंत्रित कर, चंद्रमय चरणों वाले गिरिश की सेवा करती रही।
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