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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 57
तत्राग्निमाधाय समित्समिद्धं स्वमेव मूर्त्यन्तरमष्टमूर्तिः । स्वयं विधाता तपसः फलानां केनापि कामेन तपश्चचार ॥
वहाँ अष्टमूर्ति शिव ने अग्नि प्रज्वलित कर, उसे अपनी ही अन्य मूर्ति मानकर, तप के फलों के विधाता होते हुए भी किसी विशेष कामना से तप किया।
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