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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 56
तुषारसङ्घातशिलाः खुराग्रैः समुल्लिखन्दर्पकलः ककुद्मान् । दृष्टः कथञ्चिद्गद्वयैर्विविग्नैरसोढसिंहध्वनिरुन्ननाद ॥
बर्फ के समूह से बनी शिलाओं को अपने खुरों से कुरेदता हुआ गर्वीला वृषभ, दो गजों से विचलित होकर, सिंह की गर्जना को सहन न कर पाने के कारण जोर से गरज उठा।
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