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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 48
लज्जा तिरवां यदि चेतसि स्यादसंशयं पर्वतराजपुत्र्याः । तं केशपाशं प्रसमीक्ष्य कुर्युर्वालप्रियत्वं शिथिले चमर्यः ॥
यदि पर्वतराज की पुत्री के मन में लज्जा न होती, तो उसके केशपाश को देखकर चमरियाँ भी उसे अपना प्रिय बना लेतीं।
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