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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 46
प्रवातनीलोत्पलनिर्विशेषमधीरविप्रेक्षितमायताक्ष्या । तया गृहितं नु मृगाङ्गनाभ्यस्ततो गृहीतं नु मृगाङ्गनाभिः ? ॥
उसकी विस्तृत आँखों की चंचल दृष्टि, जो पवन से हिलते नीलकमल के समान थी, क्या उसने मृगनयनी स्त्रियों से ली थी या उन्होंने उससे ग्रहण की थी?
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