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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 45
स्वरेण तस्याममृतस्रुतेव प्रजल्पितायामभिजातवाचि । अप्यन्यपुष्टा प्रतिकूलशब्दा श्रोतुर्वितन्त्रीरिव ताड्यमाना ॥
उसकी मधुर वाणी अमृत की धारा के समान थी, और उसमें यदि कोई प्रतिकूल शब्द भी होता, तो वह श्रोता को ऐसे लगता मानो वीणा की तारों को छेड़ा जा रहा हो।
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