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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 44
पुष्पं प्रवालोपहितं यदि स्यान्मुक्ताफलं वा स्फुटविद्रुमस्थम् । ततोऽनुकुर्याद्विशदस्य तस्या स्ताम्रौष्ठपर्यस्तरुचः स्मितस्य ॥
यदि प्रवाल पर रखा हुआ पुष्प या विद्रुम में जड़ा हुआ मोती हो, तो वह उसके स्वच्छ और लाल अधरों से प्रस्फुटित मुस्कान की शोभा का अनुकरण कर सकता है।
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