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कुमारसंभवम् • अध्याय 1 • श्लोक 38
तस्याः प्रविष्टा नतनाभिरन्ध्र रराज तन्वी नवलोमराजिः । नीवीमतिक्रम्य सितेतरस्य तन्मेखलामध्यमणेरिवार्चिः ॥
उसकी झुकी हुई नाभि में प्रवेश करती हुई पतली रोमावली ऐसी शोभा दे रही थी जैसे श्वेत वस्त्र को पार कर मेखला के मध्य स्थित मणि की आभा चमक रही हो।
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